राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
भिवानी। अरोड़ा विकास मंच के राष्ट्रीय विस्तारक सुरेश अरोड़ा ने कुरुक्षेत्र में पंचनद स्मारक के निर्माण में हो रही देरी और विभाजन विभीषिका दिवस के आयोजन को लेकर आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कुरुक्षेत्र की पवित्र धरा पर पंचनद स्मारक का निर्माण कराए बिना विभाजन विभीषिका दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है। सरकार के चहेते और निर्माण कमेटी केवल औपचारिकताएं पूरी कर पंजाबी एवं विस्थापित समाज को गुमराह करने में जुटे हैं।
सुरेश अरोड़ा ने बेहद कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि इस पंचनद स्मारक के निर्माण के नाम पर पिछले करीब 15 सालों से आम जनता और पंजाबी समाज से चंदा एकत्रित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस चंदा वसूली खेल में सरकार के कुछ चहेते लोग भी शामिल हैं। बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक बात यह है कि पिछले 15 वर्षों से जुटाए गए इस भारी-भरकम चंदे का न तो कोई हिसाब दिया जा रहा है और न ही स्मारक का निर्माण कार्य पूरा कराया जा रहा है। यह केवल निर्माण में देरी का मामला नहीं है, बल्कि उस पंजाबी और विस्थापित समाज के साथ सीधा विश्वासघात है, जिसने अपने पूर्वजों की स्मृति में स्वेच्छा से योगदान दिया था।
विभाजन के वास्तविक दर्द और इतिहास के अनदेखे पन्नों को उजागर करने के संदर्भ में सुरेश अरोड़ा ने लेखक डा. राम आहूजा द्वारा लिखित तथा पंकज ग्रोवर द्वारा संकलित एवं संपादित नई पुस्तक पंचनद प्रवाह-2 का विशेष उल्लेख किया। अरोड़ा ने कहा कि 1947 का भारत विभाजन केवल सीमाओं का बंटवारा नहीं था, बल्कि मानवता का सबसे बड़ा नरसंहार और त्रासदी थी। करोड़ों लोगों का संसार पल भर में उजड़ गया। घर, खेत, मंदिर, गुरुद्वारे छूट गए और अपने बिछड़ गए। इतिहास ने आजादी का जश्न तो याद रखा, लेकिन लाखों विस्थापित परिवारों की चीखें और बलिदान स्मृतियों की धूल में दबा दिए गए। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक किसी के प्रति विद्वेष फैलाने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के सत्य को पूरी ईमानदारी से स्वीकार करने का एक प्रयास है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुभवों और ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित यह रचना पाठकों से सवाल करती है कि क्या आने वाली पीढिय़ों को अपने पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान का पूरा सत्य जानने का अधिकार नहीं है। उन्होंने मांग की कि पंचनद स्मारक के नाम पर पिछले 15 सालों में एकत्र की गई राशि का संपूर्ण लेखा-जोखा तुरंत सार्वजनिक किया जाए। कुरुक्षेत्र में पंचनद स्मारक का निर्माण कार्य बिना किसी देरी के समयबद्ध सीमा के भीतर पूरा किया जाए, ताकि विभाजन के बलिदानियों को सच्चा सम्मान मिल सके तथा तथा प्रधानमंgत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा और बिरादरी के प्रति सार्थक विचारो को अमलीजामा पहनाकर उनकी छवि को चार चांद लगाए जाए। 1947 के विस्थापितों द्वारा शून्य से शुरुआत कर राष्ट्र निर्माण में दिए गए अतुलनीय योगदान को इतिहास की मुख्यधारा में उचित स्थान दिया जाए।
