
राजेश बिष्ट
उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक आस्थाओं के लिए प्रसिद्ध है। इस धरती में लोक कला, गीत, संगीत और नृत्य की समृद्ध परंपराएँ हैं, जो न केवल यहां के लोगों का आत्म-सम्मान हैं, बल्कि पूरे देश और विदेश में उत्तराखंड की पहचान को भी सशक्त बनाती हैं। इन लोककलाओं के प्रचार-प्रसार में एक महत्वपूर्ण नाम है, भगवत मनराल। भगवत मनराल जिन्होंने पिछले 24 वर्षों से उत्तराखंड की संस्कृति और धार्मिक आस्थाओं को देश में प्रस्तुत करने का कार्य किया है, उनके प्रयासों से उत्तराखंडी संस्कृति को वैश्विक पहचान मिली है।

भगवत मनराल ने अपनी यात्रा की शुरुआत गुरु शिव पंत जी के आशीर्वाद व नृत्य गुरु अरविंद नेगी से बहुत ही छोटे स्तर से की थी, लेकिन उनके समर्पण और संघर्ष ने उन्हें एक राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनका मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की संस्कृति, पहनावा, बोली और लोक कला को एक मंच प्रदान करना था।

वे मानते हैं कि आजकल की युवा पीढ़ी पश्चिमी सभ्यता की ओर आकर्षित हो रही है और अपनी जड़ों से दूर जा रही है। इसलिए, उन्होंने अपनी संस्कृति को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए कई पहल की हैं।

भगवत मनराल ने पर्वतीय कला संगम नाम से एक सांस्कृतिक टीम बनाई है, जो उत्तराखंड के लोकगीतों, नृत्य और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करती है। इस टीम में लगभग 40 सदस्य हैं, जो विभिन्न कलाओं में माहिर हैं। उनका उद्देश्य है कि इस टीम के माध्यम से उत्तराखंडी संस्कृति को व्यापक स्तर पर फैलाया जाए, ताकि न केवल उत्तराखंड के लोग, बल्कि देश और विदेश में भी लोग इसे जान सकें और सराह सकें।

भगवत मनराल की टीम में शामिल कलाकारों के बीच एक अच्छा तालमेल और सहयोग है। प्रत्येक रविवार को निशुल्क अभ्यास कक्षाओं का आयोजन किया जाता है, जहां पुराने और नए कलाकार एक साथ मिलकर उत्तराखंडी लोकगीतों और नृत्य की तैयारियां करते हैं। इसके अलावा, टीम धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान विभिन्न प्रकार की झांकी प्रस्तुत करती है, जो न केवल धार्मिक आस्था को बढ़ावा देती हैं, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक कला और संस्कृति को भी सहेजने का कार्य करती हैं।

भगवत मनराल का मानना है कि संस्कृति केवल एक कागजी शब्द नहीं है, बल्कि यह एक जीती जागती परंपरा है, जो हमारी पहचान बनाती है। यही कारण है कि वे चाहते हैं कि उत्तराखंड की संस्कृति और उसके पारंपरिक गीत, नृत्य, पहनावा, और बोलियां पूरी दुनिया में फैलें। इसके लिए उन्होंने कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया है और अब उनका प्रयास है कि यह सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ी के बीच जीवित रहे।

उत्तराखंड की संस्कृति न केवल उसकी लोककलाओं, बल्कि उसकी धार्मिक आस्थाओं और पर्वों से भी जुड़ी हुई है। भगवत मनराल अपनी टीम के साथ उत्तराखंडी जागरण, धार्मिक उत्सवों और अन्य सांस्कृतिक आयोजनों में भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से वे उत्तराखंड की धार्मिक आस्थाओं को बढ़ावा देते हैं और उत्तराखंडी समाज की एकता और सद्भाव को सुदृढ़ करते हैं।

उनकी टीम द्वारा आयोजित जागरण और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में श्रद्धालु न केवल उत्तराखंडी लोकगीतों का आनंद लेते हैं, बल्कि वे उत्तराखंडी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के प्रति अपनी श्रद्धा भी व्यक्त करते हैं। यह आयोजन उत्तराखंडी समाज के साथ-साथ अन्य राज्य और देशों में भी लोकप्रिय हो रहे हैं, जिससे उत्तराखंडी संस्कृति का प्रसार होता जा रहा है।

भगवत मनराल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य उत्तराखंड की युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से अवगत कराना है। वे मानते हैं कि पश्चिमी सभ्यता की ओर बढ़ते हुए युवा अपनी पारंपरिक संस्कृति से दूर हो रहे हैं। इसलिए, उन्होंने अपनी कला और संस्कृति को प्रमोट करने के लिए भारत के कई स्थानों पर युवाओं के समूहों के साथ काम किया है। उनके प्रयासों से कई युवाओं ने अपनी लोक कला में रुचि लेना शुरू किया है और अब वे उत्तराखंडी संस्कृति को गर्व से अपनाने लगे हैं।

भगवत मनराल का योगदान उत्तराखंड की संस्कृति को पुनः जीवित रखने और उसे एक वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने में बहुत महत्वपूर्ण है। उनका यह कार्य न केवल उत्तराखंडी समाज के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्त्रोत है। उनके द्वारा किए गए प्रयासों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को सम्मान और पहचान मिली है, और उनकी मेहनत से यह उम्मीद जताई जा सकती है कि उत्तराखंडी संस्कृति आने वाली पीढ़ी में जीवित रहेगी।
