नई दिल्ली

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने भारत का सर्वोच्च न्यायालय में ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों और महिला यौनकर्मियों के रक्तदान पर लगी रोक को उचित ठहराया है। सरकार ने कहा कि यह फैसला किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया है। मामले की सुनवाई सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के समक्ष हुई।
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत में दलील पेश करते हुए कहा कि राष्ट्रीय रक्त नीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रक्तदान सुरक्षित डोनर समूहों से ही लिया जाए, ताकि मरीजों को किसी प्रकार के संक्रमण का खतरा न हो।स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया है कि ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों और महिला यौनकर्मियों में एचआईवी के साथ-साथ हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी संक्रमण का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में अधिक पाया गया है। ऐसे में इन उच्च जोखिम वाले समूहों से रक्त लेना राष्ट्रीय रक्त नीति के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
सरकार ने स्वास्थ्य मंत्रालय की वर्ष 2020–21 की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि सामान्य वयस्क आबादी की तुलना में इन विशेष समूहों में एचआईवी संक्रमण का प्रसार 6 से 13 गुना अधिक दर्ज किया गया है।केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार के प्रतिबंध केवल भारत में ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों में भी लागू हैं। कई यूरोपीय देशों में यौन रूप से सक्रिय समलैंगिक पुरुषों को रक्तदान करने से स्थायी रूप से रोका गया है, ताकि रक्त के माध्यम से फैलने वाले संक्रमणों के जोखिम को कम किया जा सके।
