फूल देई छम्मा देई : उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपरा का पर्व

राजेश बिष्ट नए भारत का उदय

भारत विविधताओं और लोक परंपराओं का देश है। हर प्रदेश की अपनी अलग संस्कृति, रीति-रिवाज और त्योहार हैं, जो वहां के लोगों के जीवन से गहराई से जुड़े होते हैं। उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति में भी कई ऐसे लोक पर्व हैं, जो प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक माने जाते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण लोक पर्व है फूल देई, जिसे पूरे उत्तराखंड में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। फूल देई पर्व हर वर्ष चैत्र मास की संक्रांति के दिन मनाया जाता है। इस दिन से हिंदू पंचांग के अनुसार नववर्ष का भी प्रारंभ माना जाता है और बसंत ऋतु अपने पूर्ण सौंदर्य के साथ प्रकृति में दिखाई देने लगती है। पहाड़ों में इस समय पेड़-पौधों पर नए फूल खिलने लगते हैं, वातावरण में ताजगी और हरियाली छा जाती है। इसलिए यह पर्व प्रकृति के स्वागत और नई खुशियों की कामना का प्रतीक माना जाता है।

फूल देई का शाब्दिक अर्थ है – फूलों की देहरी। इस पर्व में बच्चे घर-घर जाकर लोगों की देहरी (दहलीज) पर फूल चढ़ाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यह परंपरा उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही है। इस पर्व का सबसे खास आकर्षण बच्चों द्वारा गाया जाने वाला पारंपरिक गीत है –“फूल देई छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार…”इस गीत का अर्थ है कि घर की देहरी फूलों से सजी रहे, घर में अन्न-धान्य भरा रहे और परिवार में खुशहाली बनी रहे। बच्चे सुबह-सुबह जंगलों या बगीचों से रंग-बिरंगे फूल जैसे बुरांश, फ्योंली, आड़ू और सरसों के फूल इकट्ठा करते हैं। इसके बाद वे समूह बनाकर गांव के हर घर की देहरी पर फूल रखते हैं और गीत गाते हुए घर के लोगों के लिए समृद्धि और सुख की कामना करते हैं। घर के बड़े लोग बच्चों को आशीर्वाद देते हैं और बदले में उन्हें चावल, गुड़, मिठाई या पैसे देते हैं। इस प्रकार यह पर्व बच्चों के लिए भी बहुत आनंद और उत्साह का अवसर बन जाता है।

फूल देई केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक भी है। पहाड़ों में रहने वाले लोग प्रकृति के साथ गहरा संबंध रखते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि पेड़-पौधे, फूल और प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए उनका संरक्षण करना और उनसे प्रेम करना हमारी जिम्मेदारी है। फूलों से सजी देहरी यह संदेश देती है कि प्रकृति की सुंदरता और पवित्रता हमारे जीवन में खुशहाली और सकारात्मक ऊर्जा लाती है। यही कारण है कि इस पर्व को बसंत और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

फूल देई पर्व समाज में आपसी प्रेम, भाईचारे और सहयोग की भावना को भी मजबूत करता है। बच्चे जब हर घर की देहरी पर फूल रखते हैं तो वह केवल एक रस्म नहीं होती, बल्कि पूरे गांव को एक परिवार की तरह जोड़ने का माध्यम बन जाती है। इस पर्व के माध्यम से छोटे बच्चों को भी समाज की परंपराओं, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की शिक्षा मिलती है। वे सीखते हैं कि दूसरों के लिए शुभकामनाएं देना और खुशियां बांटना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आज के आधुनिक और व्यस्त जीवन में जहां लोग अपनी पारंपरिक संस्कृति से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं, वहीं फूल देई जैसे लोक पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। उत्तराखंड के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले प्रवासी उत्तराखंडी लोग भी इस पर्व को मनाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने का प्रयास करते हैं।

आज कई स्कूलों, सामाजिक संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा भी इस पर्व को मनाया जाता है ताकि नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं के बारे में जानकारी मिल सके। फूल देई छम्मा देई उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामाजिक एकता का सुंदर प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में खुशियां बांटने, प्रकृति का सम्मान करने और अपनी परंपराओं को संजोकर रखने से ही समाज में सच्ची समृद्धि आती है।इस प्रकार फूल देई केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, आशीर्वाद, प्रकृति और संस्कृति का अनमोल उत्सव है, जो हर वर्ष लोगों के जीवन में नई खुशियां और उम्मीदें लेकर आता है।

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