राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
भिवानी। दिनोद गांव स्थित राधास्वामी आश्रम में आयोजित दैनिक सत्संग में परमसंत हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने साध-संगत को आशीर्वचन देते हुए संतमत, भक्ति और मानव जीवन के मूल्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेद, शास्त्र तथा संत-महापुरुषों की वाणी परम सत्य और अनुभव की अमूल्य धरोहर है, जिसे यथावत स्वीकार करना चाहिए क्योंकि संतों के मुख से निकला प्रत्येक शब्द ब्रह्मांड का नाद होता है।

अपने प्रवचन में महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में ज्ञान के अभाव के कारण संत वाणी के उच्चारण और अर्थ विकृत हो रहे हैं, जिससे उसके वास्तविक भाव बदल जाते हैं। उन्होंने कहा कि संतों ने अपनी वाणी अपने दिव्य अनुभवों और तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप प्रकट की थी, लेकिन युग बदलने के बाद भी संत बानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक और कल्याणकारी है। उन्होंने कहा कि निरर्थक वाद-विवाद केवल अशांति को जन्म देता है, जबकि सत्संग मनुष्य को चरित्रवान, संयमी और सात्विक बनाता है। साध-संगत को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि “जैसी मन की गति होती है, वैसी ही मनुष्य की नियति बनती है।”
परमसंत ने कहा कि सच्ची भक्ति मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है, लेकिन यदि भक्ति के बाद भी व्यक्ति के भीतर निंदा, चुगली, छल और चोरी जैसी प्रवृत्तियां बनी रहें तो वह भक्ति नहीं, केवल चतुराई है। उन्होंने कहा कि मन को साधने के लिए सतगुरु की आवश्यकता होती है, क्योंकि सतगुरु ही जीव को संसार से मोड़कर परमात्मा से जोड़ने का कार्य करता है।
उन्होंने आगे कहा कि मनुष्य को अपने कर्म और धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि ऐसे कर्म करने चाहिए जिनमें धर्म समाहित हो। धर्मविहीन व्यक्ति कभी वास्तविक सत्कर्म अर्जित नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि कलियुग में संतों ने सरल और सहज भक्ति मार्ग प्रदान किया है, जो मनुष्य को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने की क्षमता रखता है।
संतमत की व्याख्या करते हुए महाराज जी ने कहा कि यह प्रीत, प्रतीति और प्रेम का मार्ग है। गुरु से प्रीत होने पर ही विश्वास उत्पन्न होता है और वही आगे चलकर प्रेम का स्वरूप धारण करता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संतमत करनी का मार्ग है “जो करेगा वही पाएगा।” प्रवचन के दौरान उन्होंने भक्त प्रह्लाद और रावण का उदाहरण देते हुए बताया कि गुरु की संगति मनुष्य के जीवन को धन्य बना सकती है, जबकि अहंकार और माया विनाश का कारण बनते हैं। अंत में उन्होंने कहा कि प्रकृति मनुष्य को वही लौटाती है जो वह संसार को देता है, इसलिए प्रेम, सेवा, संयम और सत्कर्म के मार्ग पर चलकर ही मानव जीवन को सफल बनाया जा सकता है। सत्संग में दूर-दूर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भाग लिया तथा संतमत के इन प्रेरणादायी विचारों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
