राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
भिवानी। राजनीति बड़ी निर्मम होती है। यहां न रिश्ते स्थायी होते हैं, न योगदान की कोई गारंटी होती है। सत्ता के गलियारों में कल तक जिस व्यक्ति के एक इशारे पर समीकरण बदल जाया करते थे, आज वही व्यक्ति दूसरों की उपलब्धियों पर ताली बजाकर अपने हिस्से की खामोशी को ढो रहा है।हरियाणा की राजनीति में यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में गिने जाने वाले पंडित रामबिलास शर्मा की है। आजकल शर्मा हर मंच पर दिखाई देते हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत हो, असम में सफलता हो, निकाय चुनावों के नतीजे हों, प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति हो, निगम-बोर्डों में चेयरमैन और निदेशकों की ताजपोशी हो या फिर प्रधानमंत्री के “मन की बात” कार्यक्रम की चर्चा—शर्मा हर फैसले का स्वागत करते हैं, हर उपलब्धि पर खुशी जताते हैं और हर निर्णय पर अपनी सहमति दर्ज कराते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों? क्या यह एक अनुशासित कार्यकर्ता का समर्पण है, या फिर राजनीतिक उपेक्षा को मुस्कुराकर सहने की मजबूरी? यह वही रामबिलास शर्मा हैं जिनके नाम से कभी हरियाणा भाजपा की राजनीति की दिशा तय होती थी। एक समय ऐसा था जब प्रदेश की सत्ता के समीकरण उनके बिना पूरे नहीं माने जाते थे। संगठन में उनकी पकड़, कार्यकर्ताओं पर प्रभाव और राजनीतिक समझ उन्हें भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में खड़ा करती थी।लेकिन वक्त बदला।पहला झटका तब लगा जब विधानसभा चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया। इसके बाद राज्यपाल नियुक्तियों की चर्चाओं में उनका नाम उछला, लेकिन सूची आई तो शर्मा जी कहीं नहीं थे। हाल ही में राज्यसभा चुनाव को लेकर भी समर्थकों को उम्मीद थी कि पार्टी अपने इस पुराने सिपाही को सम्मानजनक जिम्मेदारी देगी, लेकिन वहां भी निराशा हाथ लगी।

एक के बाद एक अवसर आते गए और रामबिलास शर्मा इंतजार करते रहे।सवाल उठता है कि आखिर क्यों? क्या पार्टी के पास उनके अनुभव की अब कोई आवश्यकता नहीं बची? क्या संगठन को खड़ा करने में जीवन खपा देने वाले नेता का यही राजनीतिक प्रतिफल होना चाहिए? क्या भाजपा की नई पीढ़ी पुराने योद्धाओं के योगदान को भूल चुकी है?महेंद्रगढ़ की चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक एक ही चर्चा सुनाई देती है—”समय चाहे जैसा भी हो, शर्मा आज भी पार्टी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते।”शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।या फिर शायद यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक मजबूरी भी।

वह हर नई नियुक्ति पर बधाई देते हैं, हर नए चेहरे की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं, हर संगठनात्मक फैसले का स्वागत करते हैं। लेकिन उनके समर्थकों के मन में एक टीस लगातार बनी हुई है कि जिस व्यक्ति ने पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचा, उसे आखिर पार्टी क्या वापस दे रही है?शादी के मात्र एक सप्ताह बाद ही अपने जीवनसाथी को छोड़कर पार्टी और संगठन की मजबूती के लिए घर से बाहर निकल पड़ने वाले प्रो.रामबिलास का राजनीतिक जीवन संघर्ष, समर्पण और संगठन निर्माण की मिसाल रहा है।
आपातकाल के दौरान उन्होंने पुलिस की कठोर यातनाएं झेलीं। बिहार की गया जेल में लगभग साढ़े छह फुट लंबे रामबिलास शर्मा को 5×4 फुट की संकरी कोठरी में बंद रखा गया, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। जब पार्टी का केवल एक विधायक था, तब भी उन्होंने संगठन को मजबूत बनाने के लिए दिन-रात अथक परिश्रम किया। कार्यकर्ताओं को जोड़ने और पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने हरियाणा में पार्टी को मजबूत आधार देने के लिए लगातार मेहनत की। उनके नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के सामूहिक प्रयासों का परिणाम यह रहा कि वर्ष 2014 में पहली बार हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए रामबिलास शर्मा ने पूरी निष्ठा, समर्पण और अथक परिश्रम के साथ कार्य किया, जिसके कारण उन्हें हरियाणा भाजपा के प्रमुख संगठनकर्ताओं में गिना जाता है।
राजनीति में हार से ज्यादा दर्द भुला दिए जाने का होता है।और आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रामबिलास शर्मा हार रहे हैं, या उन्हें धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है?फिलहाल तो तस्वीर यही कहती है कि भाजपा का यह वरिष्ठ नेता दूसरों की खुशियों में अपनी खुशी तलाश रहा है। चेहरे पर मुस्कान है, शब्दों में अनुशासन है, लेकिन समर्थकों के दिलों में एक सवाल लगातार गूंज रहा है—क्या यह एक कर्मयोगी की संतुष्टि है या राजनीतिक उपेक्षा का सबसे लंबा इंतजार? क्योंकि राजनीति में कई बार सबसे तेज आवाज भाषण नहीं होती, बल्कि वह खामोशी होती है जो सब कुछ कह जाती है।
