बिशनी देवी साह : उत्तराखंड की गुमनाम वीरांगना (जीवन कथा)

बिशनी देवी साह को अक्सर उत्तराखंड (तत्कालीन कुमाऊँ / अल्मोड़ा क्षेत्र) की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी / आन्दोलनकारी माना जाता है। उनका जन्म 12 अक्टूबर 1902 को बागेश्वर (अब उत्तराखंड में) हुआ था। शिक्षा की दृष्टि से उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने केवल कक्षा चौथी तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी। माध्यम-वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली बिशनी देवी को छोटे ही उम्र में सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनकी शादी अल्मोड़ा के एक अध्यापक रामलाल साह से हुई थी, लेकिन कुछ वर्षों बाद उनका निधन हो गया।

बिशनी देवी साह का कलम, भाषण या कोई बड़ा मंच न था, लेकिन उनकी सक्रिय भागीदारी और साहस उन्हें विशेष बनाती है। वे महात्मा गांधी की विचारधारा और स्वतंत्रता आंदोलन की जन-जागृति से प्रेरित थीं और लगभग 19 वर्ष की उम्र से उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। वे केवल दर्शक नहीं थीं, बल्कि स्थानीय आन्दोलनकारियों और अन्य महिलाओं को भी जोड़ने का काम करती थीं।महत्वपूर्ण आंदोलनों और गिरफ्तारीउनका सक्रिय योगदान 1930 के दशक में चरम पर पहुंचा, खासकर 25 अक्टूबर 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका में तिरंगा फहराने के अभियान में।

यह घटना ब्रिटिश शासन के लिए चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि उस समय तिरंगा फहराना दंडनीय माना जाता था। पुलिस ने आंदोलन को दबाने के लिए लाठीचार्ज किया, और इस दौरान कई क्रांतिकारी घायल हुए। बिशनी देवी साह को दिसंबर 1930 में गिरफ्तार कर लिया गया था, और उन्हें जेल में भी रखा गया। इस गिरफ्तारी के बाद वे उत्तराखंड (तब-कुमाऊँ) की कम-से-कम लिखित इतिहास में पहली महिला थीं जिन्हें जेल जाना पड़ा। उनकी गिरफ्तारी और जेल की यातनाएं अंग्रेजों को उनके प्रभाव और क्रांतिकारी क्षमता से डराने के लिए पर्याप्त थीं। वहीं, उनका आंदोलन में योगदान सिर्फ एक बार की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं था वे दोबारा 1932 में भी गिरफ्तार हुई थीं और उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया था। उनकी दूसरी रिहाई 29 मई 1933 को हुई थी।

जेल के बाद संघर्ष और सामाजिक योगदानजेल से बाहर आने के बाद भी बिशनी देवी साह की भावना नहीं कम हुई। उन्होंने स्वदेशी (खादी) के प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई। वे अल्मोड़ा और आसपास के गांवों में गईं, महिलाओं को संगठित किया, और चरखा (खादी तैयार करने के लिए) प्रशिक्षण दिया। साथ ही, उन्होंने राष्ट्रवादी गतिविधियों में गुप्त रूप से काम करना जारी रखा जैसे कि पत्रवाहक बनना, धन जुटाना और क्रांतिकारियों को जरूरी सामग्री मुहैया कराना। उनकी यह सक्रिय भूमिका यह दर्शाती है कि वे केवल फरमानों के खिलाफ विरोध नहीं कर रही थीं, बल्कि महिलाओं में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाने का काम कर रही थीं।

बिशनी देवी साह का व्यक्तित्व साहसी, संवेदनशील और दूरदर्शी था। उन्होंने सिर्फ अपनी आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि अन्य महिलाओं को भी जोड़ने, प्रेरित करने और संगठित करने का काम किया। उनके नेतृत्व में अन्य महिलाओं (जैसे कुंती वर्मा, मंगला देवी, भगीरथी देवी आदि) ने स्वतंत्रता रैलियों में हिस्सा लिया था। उनकी क्रांतिकारी भावना सिर्फ ब्रिटिश सत्ता के विरोध तक सीमित न रही, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों (पर्दा-प्रथा, महिला शिक्षा की कमी, महिला संगठनों की कमी) के खिलाफ भी थी।स्वीकृति और बाद का जीवन उनकी पहचान और योगदान लंबे समय तक गुमनाम रहा, लेकिन वर्तमान में उन्हें मान्यता मिलनी शुरू हुई है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनके योगदान को याद किया है, और उनके इतिहास को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित किया है। उत्तराखंड के कई स्रोत (समाचार, इतिहास ग्रंथ) उन्हें “पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी” के रूप में वर्णित करते हैं। उनकी जीवनी और योगदान को कई स्थानों पर इतिहास गतिविधियों, पाठ्यक्रमों, जीके (जनरल नॉलेज) नोट्स आदि में शामिल किया गया है। मृत्यु और विरासतबिशनी देवी साह का निधन 1974 में हुआ था, जब वे लगभग 93 वर्ष की थीं। उनकी मृत्यु पर हजारों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, यह दर्शाता है कि उनकी लोकप्रियता और सम्मान स्थानीय लोगों में बहुत गहरा था।

आज उनकी कहानी इतिहास के पन्नों में कहीं खो सी गई थी, लेकिन हाल के वर्षों में, उनकी वीरता और योगदान फिर-से मान्यता पाने लगी है। वे न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि पूरे भारत में उन गुमनाम नायिकाओं की एक मिसाल बन गई हैं, जिन्होंने चुप-चाप, स्वयं बलिदान देकर स्वतंत्रता की राह तैयार की।बिशनी देवी साह की जीवनकथा हमें यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल पुरुषों की लड़ाई नहीं थी कई महिलाएं, अक्सर इतिहास के जानकारों और मान्यताओं के बाहर, निस्वार्थ रूप से सक्रिय थीं। उनका साहस, उनकी नेतृत्व क्षमता और उनकी सामाजिक दृष्टि (खादी-प्रचार, महिला संगठन) उनकी वीरता को और भी विशेष बनाती है।

उनकी कहानी हमें यह भी प्रेरणा देती है कि इतिहास को सिर्फ बड़े नामों से नापा न बिशनी देवी साह को अक्सर उत्तराखंड (तत्कालीन कुमाऊँ / अल्मोड़ा क्षेत्र) की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी / आन्दोलनकारी माना जाता है। उनका जन्म 12 अक्टूबर 1902 को बागेश्वर (अब उत्तराखंड में) हुआ था। शिक्षा की दृष्टि से उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने केवल कक्षा चौथी तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी। माध्यम-वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली बिशनी देवी को छोटे ही उम्र में सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनकी शादी अल्मोड़ा के एक अध्यापक रामलाल साह से हुई थी, लेकिन कुछ वर्षों बाद उनका निधन हो गया। बिशनी देवी साह का कलम, भाषण या कोई बड़ा मंच न था, लेकिन उनकी सक्रिय भागीदारी और साहस उन्हें विशेष बनाती है। वे महात्मा गांधी की विचारधारा और स्वतंत्रता-आंदोलन की जन-जागृति से प्रेरित थीं और लगभग 19 वर्ष की उम्र से उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। वे केवल दर्शक नहीं थीं, बल्कि स्थानीय आन्दोलनकारियों और अन्य महिलाओं को भी जोड़ने का काम करती थीं।

उनका सक्रिय योगदान 1930 के दशक में चरम पर पहुंचा, खासकर 25 अक्टूबर 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका में तिरंगा फहराने के अभियान में। यह घटना ब्रिटिश शासन के लिए चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि उस समय तिरंगा फहराना दंडनीय माना जाता था। पुलिस ने आंदोलन को दबाने के लिए लाठीचार्ज किया, और इस दौरान कई क्रांतिकारी घायल हुए। बिशनी देवी साह को दिसंबर 1930 में गिरफ्तार कर लिया गया था, और उन्हें जेल में भी रखा गया। इस गिरफ्तारी के बाद वे उत्तराखंड (तब-कुमाऊँ) की कम-से-कम लिखित इतिहास में पहली महिला थीं जिन्हें जेल जाना पड़ा। उनकी गिरफ्तारी और जेल की यातनाएं अंग्रेजों को उनके प्रभाव और क्रांतिकारी क्षमता से डराने के लिए पर्याप्त थीं। वहीं, उनका आंदोलन में योगदान सिर्फ एक बार की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं था वे दोबारा 1932 में भी गिरफ्तार हुई थीं और उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया था।जेल से बाहर आने के बाद भी बिशनी देवी साह की भावना नहीं कम हुई। उन्होंने स्वदेशी (खादी) के प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई। वे अल्मोड़ा और आसपास के गांवों में गईं, महिलाओं को संगठित किया, और चरखा (खादी तैयार करने के लिए) प्रशिक्षण दिया।

साथ ही, उन्होंने राष्ट्रवादी गतिविधियों में गुप्त रूप से काम करना जारी रखा जैसे कि पत्रवाहक बनना, धन जुटाना और क्रांतिकारियों को जरूरी सामग्री मुहैया कराना। उनकी यह सक्रिय भूमिका यह दर्शाती है कि वे केवल फरमानों के खिलाफ विरोध नहीं कर रही थीं, बल्कि महिलाओं में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाने का काम कर रही थीं।बिशनी देवी साह का व्यक्तित्व साहसी, संवेदनशील और दूरदर्शी था। उन्होंने सिर्फ अपनी आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि अन्य महिलाओं को भी जोड़ने, प्रेरित करने और संगठित करने का काम किया। उनके नेतृत्व में अन्य महिलाओं (जैसे कुंती वर्मा, मंगला देवी, भगीरथी देवी आदि) ने स्वतंत्रता रैलियों में हिस्सा लिया था। उनकी क्रांतिकारी भावना सिर्फ ब्रिटिश सत्ता के विरोध तक सीमित न रही, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों (पर्दा-प्रथा, महिला शिक्षा की कमी, महिला संगठनों की कमी) के खिलाफ भी थी।

उनकी पहचान और योगदान लंबे समय तक गुमनाम रहा, लेकिन वर्तमान में उन्हें मान्यता मिलनी शुरू हुई है:राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनके योगदान को याद किया है, और उनके इतिहास को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित किया है। उत्तराखंड के कई स्रोत (समाचार, इतिहास ग्रंथ) उन्हें “पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी” के रूप में वर्णित करते हैं। उनकी जीवनी और योगदान को कई स्थानों पर इतिहास गतिविधियों, पाठ्यक्रमों, जीके (जनरल नॉलेज) नोट्स आदि में शामिल किया गया है।

बिशनी देवी साह का निधन 1974 में हुआ था, जब वे लगभग 93 वर्ष की थीं। उनकी मृत्यु पर हजारों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, यह दर्शाता है कि उनकी लोकप्रियता और सम्मान स्थानीय लोगों में बहुत गहरा था। आज उनकी कहानी इतिहास के पन्नों में कहीं खो सी गई थी, लेकिन हाल के वर्षों में, उनकी वीरता और योगदान फिर-से मान्यता पाने लगी है। वे न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि पूरे भारत में उन गुमनाम नायिकाओं की एक मिसाल बन गई हैं, जिन्होंने चुप-चाप, स्वयं बलिदान देकर स्वतंत्रता की राह तैयार की।बिशनी देवी साह की जीवनकथा हमें यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल पुरुषों की लड़ाई नहीं थी कई महिलाएं, अक्सर इतिहास के जानकारों और मान्यताओं के बाहर, निस्वार्थ रूप से सक्रिय थीं। उनका साहस, उनकी नेतृत्व क्षमता और उनकी सामाजिक दृष्टि (खादी-प्रचार, महिला संगठन) उनकी वीरता को और भी विशेष बनाती है। उनकी कहानी हमें यह भी प्रेरणा देती है कि इतिहास को सिर्फ बड़े नामों से नापा न जाए, बल्कि उन गुमनाम नायिकाओं को भी याद किया जाए, जिन्होंने सीमित संसाधनों, सामाजिक बाधाओं और व्यक्तिगत चुनौतियों के बावजूद अपना योगदान दिया।

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