
राजेश बिष्ट
केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट 2026–27 को लेकर देशभर में मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सरकार ने इसे “विकसित भारत” के लक्ष्य की दिशा में एक और ठोस कदम बताया है, वहीं विपक्ष और कई अर्थशास्त्री इसे महत्वाकांक्षी तो मानते हैं, पर जमीनी चुनौतियों के समाधान में आंशिक करार दे रहे हैं। बजट की सकारात्मक बातों की चर्चा करें तो बुनियादी ढांचे, पूंजीगत व्यय, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप इकोसिस्टम पर निरंतर फोकस स्वागत योग्य है।
सड़क, रेल, लॉजिस्टिक्स और शहरी विकास से जुड़े प्रस्तावों से रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। साथ ही, एमएसएमई, स्टार्टअप और नवाचार को प्रोत्साहन देने के संकेत भविष्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान कर सकते हैं। कर व्यवस्था को सरल बनाने और अनुपालन में सहूलियत देने की दिशा में किए गए प्रयास भी मध्यम वर्ग के लिए राहत की बात हैं। हालांकि, बजट के कुछ पहलू सवाल भी खड़े करते हैं। महंगाई के दबाव से जूझ रहे आम नागरिकों को प्रत्यक्ष राहत की अपेक्षा थी, जो सीमित नजर आती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि आय की स्थिरता और छोटे किसानों की समस्याओं पर अपेक्षाकृत ठोस कदमों की कमी महसूस की गई। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्रों में आवंटन बढ़ाने की जरूरत को लेकर भी विशेषज्ञों ने चिंता जताई है,
ताकि मानव संसाधन विकास को दीर्घकालिक मजबूती मिल सके। इसके अतिरिक्त, रोजगार सृजन को लेकर घोषणाएं तो हैं, पर क्रियान्वयन की स्पष्ट रूपरेखा पर निगाहें टिकी हैं। बजट का वास्तविक प्रभाव तभी दिखेगा जब योजनाएं समयबद्ध तरीके से जमीन पर उतरें और लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। कुल मिलाकर, बजट 2026–27 दिशा और इरादों के स्तर पर सकारात्मक संकेत देता है, लेकिन चुनौतियों का समाधान इसके प्रभावी क्रियान्वयन और संतुलित प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा। सरकार के लिए यह बजट अवसर भी है और परीक्षा भी जहां उम्मीदों को परिणामों में बदलना ही इसकी सबसे बड़ी कसौटी होगी।
