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एमएनएस राजकीय महाविद्यालय में डिग्री स्कैम : फर्जीवाड़े और मिलीभगत से नियुक्तियों का आरोप
भिवानी। शिक्षा के मंदिर में नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को रेवडिय़ां बांटने का एक बड़ा मामला सामने आया है। स्थानीय महाराजा नीमपाल सिंह राजकीय महाविद्यालय में कार्यरत कई एक्सटेंशन लेक्चरर्स और सहायक प्रोफेसरों पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी तरीके से डिग्रियां हासिल की और कॉलेज प्रशासन की मिलीभगत से अपनी नियुक्तियों को अवैध से वैध करवाया।
इस बारे में रामचंद्र ने आरोप लगाया कि एक शिक्षिक कंप्यूटर साइंस, दो शिक्षिक मनोविज्ञान जैसे शिक्षकों ने सरकारी सेवा में रहते हुए राजस्थान की निजी यूनिवर्सिटीज (जैसे सिंघानिया और ओपीजेएस यूनिवर्सिटी) से पीएच.डी की डिग्रियां प्राप्त कीं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन शिक्षकों ने पीएच.डी के अनिवार्य कोर्स वर्क के दौरान न तो विभाग से अनुमति ली और न ही कोई छुट्टी ली। आरोप है कि ये शिक्षक एक ही समय पर कॉलेज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर वेतन ले रहे थे और उसी दौरान यूनिवर्सिटी में भी शारीरिक रूप से उपस्थित रहकर डिग्री ले रहे थे। यह सीधे तौर पर धोखाधड़ी और यूजीसी नियमों का उल्लंघन है।
उन्होंने सबसे गंभीर आरोप एक शिक्षिका (इतिहास) की नियुक्ति पर लगााय। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षिका की एम.ए. की डिग्री आईएएसई यूनिवर्सिटी सरदारशहर (राजस्थान) से है, जो 2016-17 में एक्सटेंशन लेक्चरर के लिए वैध नहीं थी। जबकि उक्त यूनिवसिर्टी डीम्एड-2 बी यूनिवर्सिटी है, जिसे डिस्टेंस से डिग्री करवाने का अधिकार ही नहीं है तथा इससे संबंधित कोर्ट केस का फैसला वर्ष 2024 में आया था।
उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन प्राचार्य राजकुमार शर्मा ने अपने प्रोफेसर मित्र की पत्नी (शिक्षिका) को लाभ पहुंचाने के लिए डा. सुनीता चौहान द्वारा नियमों के अनुसार बनाए गए पैनल को पूरी तरह से बदल दिया गया। सुनीता चौहान ने जो पैनल बनाया था, उसमें यह स्पेशल टिप्पणी की थी कि शिक्षिका की डिग्री डीम्एड यूनिवर्सिटी से है, इसको चैक किया गया, लेकिन डिग्री की वैद्यता चैक करने की बजाए पैनल ही बदल दिया गया। बताया गया कि शिक्षिका मूल मेरिट सूची में काफी नीचे थीं, लेकिन विभागाध्यक्षों की मिलीभगत से उन्हें पहले नंबर पर लाकर नियुक्त कर दिया गया।
उनका दावा है कि कॉलेज प्रशासन इन अनियमितताओं को दबाने में पूरी मदद कर रहा है। मनोविज्ञान विभाग के अन्य लेक्चरर्स पर भी आरोप है कि उन्होंने सेवा के दौरान बिना सूचना दिए डिग्रियां हासिल कीं और अब उन्हें छुपाकर रख रहे हैं।
उन्होंने प्रशासन और उच्च शिक्षा विभाग से इस मामले में तुरंत जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इस प्रकार अवैध डिग्रियों के आधार पर इनएलिजिबल उम्मीदवारों को पक्का करना न केवल कॉलेज के माहौल को दूषित करता है, बल्कि छात्रों के भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गंभीर चोट करता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि महाविद्यालय प्रशासन इस प्रकार के भ्रष्टाचारियों के पूरी तरह से पक्ष में खड़ा रहता है तथा बार-बार आरटीआई लगाने के बावजूद भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई जवाब नहीं दिया जाता।
