नए भारत का उदय

आज के दौर में बच्चे अधिकारों के मामले में तो जागरूक हो चुके हैं, लेकिन कर्तव्यों की बात आते ही वे पीछे हट जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संधि (UNCRC) ने बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद, भोजन और सुरक्षा जैसे मौलिक अधिकार दिए हैं, जो निश्चित रूप से सराहनीय हैं। लेकिन यही अधिकार अब माता-पिता के सम्मान और उनके प्रति दायित्व को कुचलने का हथियार बन गए हैं। बच्चे खेलकूद के नाम पर देर रात तक मोबाइल पर चिपके रहते हैं, शिक्षा को बोझ मानते हैं, भोजन-पोषण पर लापरवाह होते हैं, और उम्र की दहलीज पर कदम रखते ही माता-पिता को बेशर्मी से कोसने लगते हैं।
लेकिन जब बात बुजुर्ग माता-पिता की सेवा या उनके सम्मान की आती है, तो वे खुद को किनारे कर लेते हैं। यह विडंबना ही है कि “बच्चों को अधिकार पता है, पर कर्तव्य भूल गए।”खेलकूद से लेकर शिक्षा तक बच्चों के अधिकारों का प्रचार तो हो रहा है, लेकिन संतुलन कहाँ? खेलकूद आवश्यक है, लेकिन स्कूलों में 70% से अधिक बच्चे शारीरिक गतिविधियों के बजाय स्क्रीन टाइम में डूबे रहते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, किशोरों में मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ 40% बढ़ चुकी हैं, फिर भी वे माता-पिता को दोष देते हैं।
शिक्षा का अधिकार है, लेकिन होमवर्क या पढ़ाई के समय पर वे विद्रोह कर बैठते हैं। “मुझे पढ़ने का मन नहीं” कहकर वे अधिकारों का ढोंग करते हैं, जबकि माता-पिता रात-दिन कमाते-पढ़ाते थक जाते हैं।भोजन और पोषण के मामले में तो हद हो जाती है। बच्चे फास्ट फूड और जंक फूड पर अड़ जाते हैं, घर का सात्विक भोजन ठुकरा देते हैं। सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत के शहरी बच्चों में 60% कुपोषण की समस्या पसंदीदा खान-पान से जुड़ी है। माता-पिता जो प्यार से बनाते हैं, उसे “बोरिंग” कहकर फेंक देते हैं।
उम्र की दहलीज पर पहुँचते ही यह बेशर्मी चरम पर पहुँच जाती है। किशोरावस्था में हार्मोनल बदलावों का हवाला देकर वे माता-पिता को अपमानित करते हैं, घर से भागने की धमकी देते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो देखें तो बच्चे माता-पिता को मजाक के नाम पर कोसते नज़र आते हैं , और कमेंट्स में “अधिकार” की तालियाँ बजती हैं। NCRB डेटा के मुताबिक, 2024 में परिवारिक विवादों में बच्चों की भूमिका 25% बढ़ी है।कर्तव्यों की अनदेखी: माता-पिता का अपमान सबसे दुखद तब होता है जब कर्तव्यों की बात आती है।
भारतीय संस्कृति में “माता-पिता देवतुल्य” का सिद्धांत है, लेकिन आज के बच्चे इसे भूल चुके हैं। माता-पिता बूढ़े हो जाएँ, बीमार पड़ें, तो बच्चे उन्हें बोझ मानते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के अनुसार, 30% बुजुर्ग माता-पिता को बच्चों से उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। बच्चे कहते हैं, “तुम्हें क्या अधिकार है हमें टोकने का?” लेकिन खुद उसी उम्र में वही गलतियाँ दोहराते हैं। घर के कामों में हाथ बटाने से इनकार, माता-पिता की सलाह को “पुरानी सोच” कहना , ये सब वास्तव में कर्तव्यहीनता के ही लक्षण हैं।यह समस्या सिर्फ घरों तक सीमित नहीं। स्कूलों में भी बच्चे शिक्षकों को चुनौती देते हैं, “मेरा अधिकार है बोलने का।” परिणामस्वरूप अनुशासनहीनता बढ़ रही है।
UNESCO की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 50% छात्रों में जिम्मेदारी की कमी है, जो भविष्य में सामाजिक विघटन पैदा करेगी। बोलनेका अधिकार है, समझना सही है, पर कब , कहाँ , किस से और कैसे बोलना है ये न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक कर्तव्य भी है, किंतु विडंबना यह है कि आज बच्चे अपने कर्तव्यों से दूर भागते प्रतीत हो रहे हैं।मेरे विचार से इसका एक अंतिम समाधान अभी भी शेष है जो सरकारों के नियमों को परे कर अपने बच्चों को अधिकारों के साथ कर्तव्य सिखाएगा वह बच्चा और परिवार निश्चित रूप से उज्ज्वल भविष्य का निर्माता होगा।
समस्या का समाधान अधिकारों को कर्तव्यों से जोड़ने में है और इसके लिए शिक्षक और माता-पिता को पूर्व की भांति पुनः साथ चलना होगा। जब बच्चा घर आ कर किसी टीचर की बुराई करता है, शिकायत करता है तो उसे चुपचाप सुने और बच्चों को तब भी टीचर की रिस्पेक्ट के लिए बोलें और आपकी नजर में भी अगर टीचर गलत है तो उक्त टीचर से व्यक्तिगत संपर्क करें और बात की तह तक जाएं। बच्चों को बताएं के माता-पिता की तरह टीचर्स भी कभी उनका बुरा नहीं सोचते याद रखें बच्चे अगर आज कर्तव्य सीख लेंगे, तो कल वे जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। नहीं तो पछतावे के साथ उम्र भर यही कहते रहेंगे -“बच्चों को अधिकार पता है, पर कर्तव्य भूल गए।
“अभिषेक शर्मा अभि” हिंदी विभाग टी.आई.टी.वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, भिवानी
