राजेश बिष्ट नए भारत का उदय

भिवानी। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाले नवरात्रि के पावन पर्व के अवसर पर गांव धनाना में एक विशेष आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर माता रानी की पूजा-अर्चना की और नवरात्रि से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों को विधिपूर्वक संपन्न किया। नवरात्र के दौरान अखंड ज्योति प्रज्वलित की गई, जौ बोए गए, नारियल स्थापित किया गया तथा माता के सोलह श्रृंगार कर भक्तों ने सुबह-शाम श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना की।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित बीके रजनी दीदी जी ने नवरात्रि पर्व के पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्यों को सरल और प्रभावी ढंग से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि नवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति और आंतरिक शुद्धि का विशेष अवसर है। उन्होंने बताया कि अखंड ज्योति आत्मा का प्रतीक है। जैसे यह ज्योति निरंतर जलती रहती है, उसी प्रकार आत्मा भी अजर, अमर और अविनाशी है। जब मनुष्य अपनी आत्मा का संबंध परम पिता परमात्मा से जोड़ता है और स्नेहपूर्वक उनका स्मरण करता है, तो उसे अपार शक्तियां प्राप्त होती हैं।
बीके रजनी दीदी ने सोलह श्रृंगार के महत्व को भी आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि यह श्रृंगार वास्तव में उन दिव्य गुणों का प्रतीक है, जो परमात्माy के साथ योग लगाने से आत्मा में विकसित होते हैं। उन्होंने कहा कि जब आत्मा परमात्मा से जुड़ती है, तो उसमें शांति, प्रेम, सुख, पवित्रता और आनंद जैसे गुण स्वतः ही प्रकट होने लगते हैं, जिन्हें प्रतीकात्मक रूप से सोलह श्रृंगार के रूप में दर्शाया गया है।
उन्होंने श्रीफल (नारियल) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि नारियल का बाहरी कठोर आवरण और अंदर का कोमल भाग यह दर्शाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हों, यदि आत्मा परमात्मा की याद में स्थित रहती है, तो वह भीतर से कोमल, सुरक्षित और दिव्य गुणों से परिपूर्ण बनी रहती है। परमात्मा की छत्रछाया में रहने वाला व्यक्ति बाहरी कठिनाइयों से प्रभावित हुए बिना आंतरिक शांति का अनुभव करता है।
कार्यक्रम के दौरान जौ बोने की परंपरा के पीछे छिपे संकेत को भी समझाया गया। बीके रजनी दीदी ने कहा कि नवरात्रि का समय एक ओर जहां खेतों में फसल की कटाई का समय होता है, वहीं यह हमें जीवन में किए गए कर्मों का फल प्राप्त करने और नए पुण्य कर्मों की खेती करने का संदेश देता है। जौ बोना इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने जीवन में अच्छे कर्मों के बीज बोने चाहिए, ताकि भविष्य में सुखद परिणाम प्राप्त हो सकें।
उन्होंने उपवास के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि उपवास का अर्थ केवल भोजन का त्याग करना नहीं है, बल्कि ‘उप+वास’ अर्थात स्वयं को मन और बुद्धि से ऊपर उठाकर परमात्मा के समीप स्थित करना है। इस दौरान तन, मन और अन्न की शुद्धि पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिससे व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
बीके रजनी दीदी ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि यदि हम नवरात्रि के प्रत्येक रीति-रिवाज के पीछे छिपे आध्यात्मिक अर्थ को समझकर इस पर्व को मनाएं, तो यह हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला बन सकता है। उन्होंने कहा कि पवित्रता की धारणा से न केवल व्यक्तिगत जीवन में सुधार आता है, बल्कि पूरा समाज भी नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त होकर एक सुंदर और सुसंस्कृत समाज का निर्माण कर सकता है।इस अवसर पर ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी भाई-बहनों के साथ-साथ बड़ी संख्या में माता के श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने कार्यक्रम के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर नवरात्रि पर्व को और अधिक सार्थक बनाने का संकल्प लिया।
