एक सवाल

आज भी एक सवाल जबाब खुजणु छौवा क्या कुछ बुलंण चांद छेयी,

क्या अपर मन की गेड़ खुलण चांदी छेयी।

जब भी या आँखि वी से मिलदी छेयी,

विकी आँखि शरम न उंद झुक जांदी छेयी,

वीक गलवड़ी सुर्ख लाल गुलाब जणी व्हे जांद छेयी।

जब कभी अमणी समणी मुलाक़ात हूँद छेयी

उंद मुंड करी कन सुरक चली जांदी छेयी

एथर जैकन फरकिन, हैंसि जांदी छेयी।कब्बि गिच्च नी खोली, आँखियू न बिंगे जांदी छेयी,

कबरी बिना बुल्या भी भौत कुछ बोली जांद छेयी,

जब समणी मिल्दी छेयी,

ऊँगली पर चुन्नी लपेटीऊंद मौणी करी कन,

मुल मुल हैंसदी छेयीवा हिया पराणी छेयी,

या सरम्याळी बाँद रायी।

आँद जांद बाट पर, वा अपरी चुन्नी फरकादीं छेयी,

कबरी पैथर फरकीकन,

सर -सर दिखणी रांदी छेयी,

वींक मन मा भी कुछ रै होलू, या म्यार मन बैम छ्यायी,

आज भी एक सवाल जबाब खुजणु छौवा क्या कुछ बुलंण चांद छेयी।

मनखी कलम बीटी।

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