राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
रानीखेत (उत्तराखंड): उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित दूनागिरी मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और प्रसिद्ध मंदिर है। समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊँचाई पर बसे इस मंदिर की पहचान न केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में है, बल्कि यह अपनी पौराणिक कथाओं और सुरम्य प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी चर्चित है। दूनागिरी में स्थित यह मंदिर माँ दुर्गा के एक रूप ‘दूनागिरी देवी’ या ‘महामाया’ को समर्पित है, और यहाँ हर वर्ष हजारों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं।

दूनागिरी मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि यहां हनुमान जी संजीवनी बूटी की खोज में आए थे। यह स्थान द्रोणगिरि पर्वत के नाम से भी जाना जाता है, और ऐसा कहा जाता है कि संजीवनी बूटी यहीं से ली गई थी। यह स्थान महर्षि द्रोणाचार्य की तपोभूमि भी माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ की देवी अत्यंत जागृत हैं और सच्चे मन से पूजा करने पर भक्तों की मनोकामनाएँ अवश्य पूरी होती हैं।दूनागिरी मंदिर का वातावरण अत्यंत शांत, निर्मल और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर है। मंदिर के चारों ओर फैली हरियाली, हिमालय की बर्फीली चोटियाँ, देवदार और बांज के वृक्ष यहाँ की सुंदरता को और निखारते हैं। यह स्थल योग, ध्यान और आत्मचिंतन के लिए भी उपयुक्त है।

सूर्य उदय और अस्त के समय मंदिर परिसर से दिखने वाले दृश्य अत्यंत मनोहारी होते हैं।दूनागिरी मंदिर तक पहुँचने के लिए सड़क मार्ग सबसे उपयुक्त है। मुख्य स्थानों से मंदिर की दूरी दिल्ली से लगभग 390 किमी, नैनीताल से लगभग 130 किमी, हल्द्वानी से लगभग 115 किमी, रामनगर से लगभग 150 किमी, रानीखेत से लगभग 47 किमी, अल्मोड़ा से लगभग 50 किमी है। दूनागिरी मंदिर के समीप डोटी नामक स्थान तक वाहन से पहुंचा जा सकता है। इसके बाद लगभग 500 सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर तक पहुँचना होता है। हालांकि रास्ता थोड़ा कठिन हो सकता है, लेकिन ऊपर पहुँचने पर मिलने वाला आध्यात्मिक अनुभव हर कठिनाई को भूलने लायक होता है।
नवरात्रों के दौरान मंदिर में विशेष पूजा, हवन और भजन-कीर्तन होते हैं। इस अवसर पर देशभर से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। मंदिर प्रबंधन द्वारा इन दिनों विशेष व्यवस्थाएँ की जाती हैं, जैसे जलपान, चिकित्सा सहायता और सफाई व्यवस्था।दूनागिरी मंदिर के आसपास के क्षेत्र में उत्तराखंडी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। यहाँ के ग्रामीण बाजारों में पारंपरिक हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्र, जड़ी-बूटियाँ और स्थानीय उत्पाद उपलब्ध हैं। साथ ही, यहाँ के लोग अतिथि सत्कार के लिए प्रसिद्ध हैं।
हालांकि सरकार और प्रशासन द्वारा मंदिर परिसर में विकास कार्य किए जा रहे हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण और साफ-सफाई को लेकर अभी और कदम उठाने की जरूरत है। स्थानीय स्वयंसेवी संगठन और युवाओं की भागीदारी इस दिशा में सराहनीय है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ईको-फ्रेंडली उपायों को अपनाने की सिफारिश की जा रही है।दूनागिरी मंदिर एक ऐसा स्थान है जहाँ आस्था, पौराणिकता और प्रकृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यह स्थल केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव है। जो भी व्यक्ति यहाँ आता है, वह माँ दूनागिरी की कृपा और हिमालय की शांति का स्पर्श लेकर लौटता है।
