राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
भिवानी। भिवानी की जगत कॉलोनी में रहने वाली 55 साल की आशा मिड्ढा को क्या पता था कि जिस मायके के साथ वो बांके बिहारी के दर पर खुशियां मनाने जा रही हैं, वही सफर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर बन जाएगा। भिवानी के मशहूर जगदंबा ढाबा चलाने वाले परिवार की ये कहानी आज हर किसी की आंखें नम कर रही है।

दरअसल, आशा मिड्ढा ने बहुत ही चाव से अपने लुधियाना वाले भाइयों और बहनों के साथ इस तीर्थ यात्रा की प्लानिंग की थी। 9 अप्रैल की रात को उनके बेटे ने उन्हें सोनीपत छोड़ा, जहां से बेटी और दामाद ने उन्हें मुरथल के पास लुधियाना से आ रही उस बस में बिठाया जिसमें उनका पूरा मायका सवार था। सोचिए, उस वक्त भाई-बहनों से मिलकर वो कितनी खुश रही होंगी, पूरा परिवार एक साथ था, हंसी-मजाक चल रहा था और मंज़िल थी कान्हा की नगरी वृंदावन।
अगली सुबह 7 बजे सबने बांके बिहारी के दर्शन किए, माथा टेका और आशीर्वाद लिया, लेकिन दोपहर 3 बजे यमुना पार करते वक्त काल ने ऐसी दस्तक दी कि सब कुछ खत्म हो गया। बीच लहरों में नाव एक पीपे वाले पुल के ड्रम से टकराई और देखते ही देखते पलट गई। चीख-पुकार मच गई, लोग अपनों को बचाने के लिए हाथ-पांव मार रहे थे, लेकिन लहरें बेरहम निकलीं। इस भयानक मंजर में आशा मिड्ढा के साथ उनके भाई चरणजीत, भाभी पिंकी, बहन अंजू, बहनोई राकेश और भतीजे मधुर समेत कुल 7 लोग हमेशा के लिए खामोश हो गए।
भिवानी से लेकर लुधियाना तक आज सिर्फ मातम का शोर है और लोग यही पूछ रहे हैं कि आखिर इन मासूमों की जान का जिम्मेदार कौन है? क्या प्रशासन की एक छोटी सी लापरवाही ने हंसते-खेलते परिवार को श्मशान बना दिया …?
