राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
भिवानी। नर सेवा ही नारायण सेवा है, इस ध्येय वाक्य को चरितार्थ करते हुए भिवानी के शतकवीर रक्तदाता राजेश डुडेजा और समाजसेविका अंकिता राजपूत की टीम ने एक बार फिर मानवता की मिसाल पेश की है। अलीगढ़ निवासी एक मरीज जो ग्रेटर नोएडा के न्यूमेड अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था, के लिए दुनिया का सबसे दुर्लभ रक्त बॉम्बे ब्लड ग्रुप (आरएच पॉजिटीव) बंगलौर से सुरक्षित मंगवाकर उसकी जान बचाने में अहम भूमिका निभाई है।

आरएच पॉजिटीव ब्लड ग्रुप, जिसे चिकित्सा विज्ञान में एचएच या ओएच फेनोटाइप कहा जाता है, दुनिया का दुर्लभतम रक्त समूह है। यह औसतन 40 लाख लोगों में से किसी एक में पाया जाता है। भारत में भी इसके गिने-चुने (लगभग 350-400) डोनर्स ही उपलब्ध हैं। सामान्य ब्लड ग्रुप में एच एंटीजन होता है, जबकि इस समूह में यह अनुपस्थित होता है, जिससे आपात स्थिति में डोनर ढूंढना लगभग नामुमकिन हो जाता है। मरीज के परिजनों के सामने चुनौती तब और बढ़ गई जब अस्पताल प्रबंधन ने रक्त के प्रकार को लेकर गलत जानकारी साझा की।
जब यह केस 29 अप्रैल को समाज सेविका अंकिता राजपूत और भिवानी के राजेश डुडेजा के पास पहुंचा तो उन्होंने तुरंत मोर्चा संभाला। राजेश डुडेजा और अंकिता राजपूत ने लगातार चार दिनों तक हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक के ब्लड बैंकों और डोनर्स से संपर्क साधा। अंतत: हैदराबाद और बंगलौर में इस रक्त की उपलब्धता की सूचना मिली।
मुंबई निवासी विनय शेट्टी और दीपक सेठी के विशेष सहयोग से बंगलौर के ब्लड बैंक से 2 यूनिट आरएच पॉजिटीव आरक्षित कराया गया। एक मई को इस दुर्लभ रक्त को विशेष कोल्ड बॉक्स के माध्यम से कूरियर द्वारा नोएडा पहुंचाया गया। भिवानी निवासी राजेश डुडेजा लगातार फोन के माध्यम से इस पूरी प्रक्रिया की मॉनिटरिंग करते रहे ताकि रक्त सुरक्षित और समय पर मरीज तक पहुंच सके।
इस पूरे अभियान में शतकवीर रक्तदाता राजेश डुडेजा की भूमिका महत्वपूर्ण रही। वह स्वयं 100 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं और उनका नेटवर्क देश भर के रक्तदाताओं से जुड़ा है। उनके और अंकिता राजपूत के समन्वित प्रयासों के कारण ही यह दुर्लभ रक्त समय पर मैच हो सका।
मरीज के परिजनों ने राजेश डुडेजा, अंकिता राजपूत और विनय शेट्टी का आभार जताते हुए कहा कि उनके निस्वार्थ संघर्ष की वजह से ही आज उनके मरीज को नया जीवन मिला है। रक्तवीरों ने कहा कि जब केस हमारे पास आया, तो स्थिति काफी गंभीर थी। यह ब्लड ग्रुप मिलना वैसे ही कठिन है, ऊपर से गलत सूचना ने समय और खराब किया। लेकिन हमारी टीम और बंगलौर के सहयोगियों के दृढ़ संकल्प ने हार नहीं मानी। आज रक्त मरीज को चढ़ाया जा चुका है और वह खतरे से बाहर है।
