राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
भिवानी। भारतीय संस्कृति, पुरातत्व और लोक परंपराओं के संरक्षण में जिन महान विभूतियों का योगदान अविस्मरणीय है, उनमें डॉ. यशोधर मठपाल का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे एक प्रतिष्ठित पुरातत्वविद्, कुशल चित्रकार, संग्रहालय विशेषज्ञ, गांधीवादी चिंतक तथा शैल कला संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान हैं। उनका संपूर्ण जीवन भारत की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित रहा है।

उत्तराखंड की सुरम्य वादियों में जन्मे डॉ. मठपाल ने अपने अथक शोध और समर्पित प्रयासों से भारतीय गुफा एवं शैल कला को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने देशभर में 400 से अधिक प्राचीन शैलाश्रयों और गुफाओं का अन्वेषण एवं अध्ययन किया, जिनमें मानव सभ्यता के प्रारंभिक जीवन, संस्कृति और कलात्मक अभिव्यक्तियों के अमूल्य प्रमाण सुरक्षित हैं। उनके शोध ने यह स्थापित किया कि भारत की शैल कला विश्व की प्राचीनतम सांस्कृतिक धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

डॉ. मठपाल की विशेषता केवल खोज और अध्ययन तक सीमित नहीं रही। उन्होंने शैल कला संरक्षण की वैज्ञानिक पद्धतियों को विकसित करने में भी अग्रणी भूमिका निभाई। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप अनेक दुर्लभ शैल चित्र और पुरातात्विक धरोहरें समय के क्षरण से सुरक्षित रह सकीं। उनकी शोधपरक पुस्तकों और चित्रकृतियों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रशंसा प्राप्त हुई है।

वर्ष 1983 में उन्होंने भीमताल में स्थित लोक संस्कृति संग्रहालय की स्थापना की। यह संग्रहालय आज उत्तराखंड की लोक संस्कृति, कला, परंपराओं और इतिहास का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहां संरक्षित सामग्री न केवल क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत का परिचय कराती है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य भी करती है।
लोक संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्होंने उत्तराखंड के लोक संस्कृति निदेशक के रूप में भी उल्लेखनीय सेवाएं दीं। उन्होंने लोक कलाओं, जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं प्रलेखन को नई दिशा प्रदान की। उनका मानना था कि किसी भी समाज की वास्तविक पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत से होती है और उसका संरक्षण राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है।
उनके अतुलनीय योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2006 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। यह सम्मान भारतीय पुरातत्व, शैल कला और लोक संस्कृति संरक्षण के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान की राष्ट्रीय मान्यता था।

डॉ. यशोधर मठपाल की विरासत केवल उनके द्वारा खोजी गई गुफाओं, संरक्षित शैल चित्रों अथवा लिखी गई पुस्तकों तक सीमित नहीं है। उनकी वास्तविक विरासत वह जागरूकता और प्रेरणा है, जो हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को समझने, संरक्षित करने और भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने का संदेश देती है। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि समर्पण, शोध और संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम के बल पर कोई व्यक्ति इतिहास और समाज दोनों पर अमिट छाप छोड़ सकता है।
आज जब आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में अनेक सांस्कृतिक धरोहरें विलुप्ति के कगार पर हैं, तब डॉ. यशोधर मठपाल का जीवन और कार्य हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने तथा अपनी विरासत के संरक्षण के लिए प्रेरित करता है। वे निस्संदेह भारतीय संस्कृति के उन महान संरक्षकों में से एक हैं, जिनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक बना रहेगा।
