राजेश बिष्ट नए भारत का उदय
किसी भी राष्ट्र, समाज या सभ्यता की वास्तविक पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति केवल रीति-रिवाजों, वेशभूषा, भाषा, कला और परंपराओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह समाज के नैतिक मूल्यों, जीवन-दर्शन और सामूहिक चेतना का आधार भी है। यही कारण है कि जहाँ संस्कृति का सम्मान होता है, वहीं से एक सशक्त, संगठित और समृद्ध समाज का निर्माण होता है।
संस्कृति व्यक्ति को उसकी जड़ों से जोड़ती है। यह उसे अपने इतिहास, पूर्वजों के संघर्षों और समाज के आदर्शों का बोध कराती है। जब कोई समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करता है और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास करता है, तब उसमें आत्मविश्वास और सामाजिक एकता का विकास होता है। इसके विपरीत, जो समाज अपनी संस्कृति से विमुख हो जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी पहचान और मूल्यों को खोने लगता है।
भारत इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। हजारों वर्षों पुरानी भारतीय संस्कृति ने “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “अतिथि देवो भवः” जैसे आदर्शों के माध्यम से पूरी दुनिया को मानवता, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व का संदेश दिया है। विविधताओं से भरे इस देश में अनेक भाषाएं, परंपराएं और जीवन-शैलियां होने के बावजूद एकता की भावना संस्कृति के कारण ही बनी हुई है।
आज वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के दौर में आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आधुनिकता और संस्कृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम विज्ञान, तकनीक और विकास के साथ-साथ अपनी लोक कलाओं, भाषाओं, साहित्य, पर्व-त्योहारों और पारिवारिक मूल्यों को भी संरक्षित रखें।
संस्कृति का सम्मान सामाजिक सौहार्द को भी मजबूत करता है। जब विभिन्न समुदाय एक-दूसरे की परंपराओं और मान्यताओं का आदर करते हैं, तब समाज में भाईचारा, सहयोग और शांति का वातावरण बनता है। यही वातावरण विकास, शिक्षा और सामाजिक प्रगति के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करता है।
नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराना समय की मांग है। विद्यालयों, परिवारों और सामाजिक संस्थाओं की यह जिम्मेदारी है कि वे युवाओं में अपनी भाषा, साहित्य, इतिहास और परंपराओं के प्रति सम्मान का भाव विकसित करें। क्योंकि जो पीढ़ी अपनी संस्कृति को समझती है, वही अपने भविष्य को भी अधिक मजबूती से गढ़ सकती है।
अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि किसी समाज की शक्ति उसकी आर्थिक संपन्नता से अधिक उसके सांस्कृतिक मूल्यों में निहित होती है। संस्कृति समाज को दिशा देती है, उसे जोड़ती है और उसकी पहचान को सुरक्षित रखती है। इसलिए यदि हमें एक सशक्त, समरस और विकसित समाज का निर्माण करना है, तो अपनी संस्कृति का सम्मान, संरक्षण और संवर्धन करना होगा। वास्तव में, जहाँ संस्कृति का सम्मान होता है, वहीं से सशक्त समाज का निर्माण होता है।
